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Wednesday, May 22, 2013

कानून की सजगता के प्रति समर्पित


Warrant-Balaw''हम कानून के दायरे में जी रहे हैं। इसलिए बाहर रहते हैं, वर्ना जेल के अंदर होते। कानून के दायरे में रहने वाले हम लोग कानून की जानकारी के बगैर जी रहे हैं। यही सचाई है। इसी वजह से हमने अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनजान होकर, बेकार के मामलों में फँसकर जिंदगी को दुखमय बना लेते हैं।


हम इस बदहाली में क्यों और कैसे पहुँच गए? इसका एकमात्र कारण यही है कि जनता को कानून के प्रति जागरूक बनाने की दिशा में न सरकार सजग है, न लोगों की इस ओर कोई दिलचस्पी है। इस संदर्भ में तमिलनाडु के एक प्रसिद्घ एवं माननीय नेता का, जो विधिशास्त्र के जानकार नहीं थे, कथन याद आ रहा है। उन्होंने कहा था—'कानून एक अंधकक्ष है। उसमें वकील की दलील चिराग का काम करता है। इस गलत उक्ïित ने भोली-भाली जनता को कितने भ्रमजाल में डाल दिया, इसका कोई हिसाब नहीं।


चूँकि आप बाहर हैं, इसलिए कानून की सीमा के अंदर जी रहे हैं। कानून की जानकारी के बिना जब आप कानून के दायरे में जी रहे हैं, ऐसे कानून को अंधेरा कमरा कहना कहाँ तक उचित है? और फिर वकील की दलील को क्यों चिराग कहा जाए? दोनों ही उक्तियाँ कानून के प्रति अज्ञानवश कही गई बातें थीं।


मान लीजिए कि कानून का अनुपालन करने से किसी को घाटा हो गया। तब उस कानून का नाम भी 'घाटा होना चाहिए। घाटेवाला कानून हमारे किस काम का?


१९९९ में काम्पैक्ट इलैक्ट्रिक नामक कंपनी में काम करता था। वहाँ हमारे सामने र्क समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। मुझे इन समस्याओं के कानूनी आधार का कोई ज्ञान नहीं था। दरअसल उन दिनों मैं कानून के बारे में कुछ नहीं जानता था। मैंने कानून की किताबें उलट-पुलट कर देखीं, पर मुझे पता नहीं चला कि हमें किस कानून के तहत कहाँ से निजात मिल सकती थी। तब इस शंका का निवारण पाने हेतु समाज के जानकार लोगों से मिलने के लिए कई जगह घूमा। भ्रम बढ़ते चले गए, कम नहीं हुए। उन लोगों ने मेरी उलझनों को दूर करने के बजाय मुझे और उलझनों में फँसा दिया।


इसी दौरान एक बड़े वकील से मेरी मुलाकात हुई। उसने अपने एक जूनियर को मेरे मुकदमे में हा$िजर होने के लिए भेजा। तभी मुझे पता चला कि श्रमिक कानून के विषय में उस जूनियर वकील का ज्ञान मेरे से काफी कम था। मैंने तय कर लिया कि अब वकील की तलाश में भागादौड़ी करने की $जरूरत नहीं है।


यों इधर-उधर काफी घूमने के बाद एक बार मैं रेलगाड़ी से घर लौट रहा था, किसी यात्री के हाथ से एक किताब पढऩे को मिली—'अदालत में अपना मुकदमा खुद लड़ सकते हैं। यह पुस्तक अरुप्पुकोट्टै के चेंतमिल किष़ार की लिखी हुई थी। मुझे याद आया—'अरे, दो साल पहले यही किताब मैंने चेन्ïनै के कन्निमैरा पुस्तकालय में पढ़ी थी। उस समय पढ़ तो गया था लेकिन उस किताब में चर्चित विषय समझ में नहीं आया था। कारण यही कि उस किताब में कानूनी बातों की पूरी जानकारी सही ढंग से नहीं दी गई थी।


फिर भी मैं खुश हुआ कि सही सलाहकार मिल गए। मैं सीधे अरुप्पुकोट्टïै जाकर चेंतमिल किष़ार से मिला। उन्होंने मेरे मामले का अध्ययन करके दो टूक जवाब दे दिया कि तुम्हारे मामले में कोई दम नहीं है। इसलिए मैं कोई सलाह नहीं दे सकता।


उनसे सलाह तो नहीं मिली, लेकिन इस घटना ने मेरी आँखें खोल दीं। एक तर$फ कुछ लोग हैं जो सही विषय-ज्ञान के बिना जानकारों की तरह बातें बनाते हैं, तो दूसरी तर$फ जानकार व्यक्ïित भी, मामले में इन्सा$फ मिलने की गुंजाइश न होने का कारण बताकर कानूनी सलाह देने से भी इनकार कर देता है। इसमें अ$फसोस करने की कोई बात नहीं है। क्योंकि उस व्यक्ति ने वही बात कही जो उसकी जानकारी में थी, बस।


मैं सोचने लगा, ठीक है... अब कौन-सा रास्ता पकडूँ। तभी मन में एक संकल्प जगा—अब किसी से सलाह नहीं लेनी है, बल्कि मुझे स्वयं कानूनी सलाहकार बन जाना है। यह कोई अत्युक्ति नहीं है कि इसी पक्ïके इरादे ने मुझे मौजूदा रूप में ढाल दिया।


यह मेरी दूसरी पुस्तक है। २००४ में मैंने एक किताब लिखी थी—जमानत कैसे ले सकते हैं? मुझे लगता है, लोगों में कानूनी $जागरूकता पैदा करने के लिए कम से कम पाँच किताबें लिखनी होंगी।


नब्बे फीसदी लोग आपको ऐसे मिलेंगे जो यही कल्पना पाल रहे होते हैं कि अपनी समस्या ही सबसे बड़ी है। मैं अपने अनुभव से बताना चाहता हूँ कि अगर हम समाज के हित में थोड़ी चिंता करने लग जाएँ तो हमारे ज्ञान में वृद्घि होगी, और इसी ज्ञान के बल पर समस्या का सामना करके उसका हल निकाला जा सकता है। हमारी —'केअर सोसाइटी के सदस्य यही काम करते हैं।


केअर सोसाइटी के सदस्यों ने इस धारणा को झुठला दिया है कि भुक्तभोगी को ही समस्या की गर्मी महसूस हो सकती है। इस सोसाइटी के लगभग सारे सदस्य निजी कंपनियों में काम करने वाले हैं, ह$जारों की तनख्वाह पाने वाले हैं। उनकी अपनी कोई निजी समस्या या मामला नहीं है। फिर भी समाज के सहजीवियों की मुश्किलें दूर करने में उत्साह से लगे हुए हैं। उनकी यह सामाजिक प्रज्ञा देखकर मन प्रफुल्ïल हो जाता है। यदि आप भी कानून के प्रति जागरूकता के साथ इस दिशा में अपना योगदान करें तो हम सब मिलकर समस्या-रहित समाज को रूप देने में कामयाब हो सकेंगे।


समस्या या मुश्किल को देखकर हमें डरना नहीं चाहिए, बल्कि ऐसी स्थिति पैदा करानी चाहिए जिसमें मुश्किल हमें देखकर खुद डरने लग जाए कि इस आदमी से दूर रहना ही बेहतर है। आज की हालात में मेरे ऊपर तीन वारंट हैं, इसके बावजूद किसी भी परेशानी के बिना मैं बाहर, तिस पर भी अदालतों में घूम-फिर रहा हूँ। विधि के क्षेत्र में इतनी खामियों के होने का कारण कानून के प्रति जनता का अज्ञान ही है।


दूसरी ओर अगर हम वकील के पेशे में आने वाले व्यक्तियों की शैक्षिक योग्यता पर विचार करें तो पता चलेगा कि पढ़ाई में आगे रहने वाले छात्र चिकित्सा, सूचना-प्रौद्योगिकी, इंजीनियरी जैसे क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं। बाकी बचे हुओं में से $ज्यादातर छात्र कानून की पढ़ाई को चुनते हैं। ये ही लोग आगे चलकर न्यायाधीश के पद पर तैनात होते हैं। इस स्थिति में बदलाव लाना है तो कानून की पढ़ाई को चुनने वालों के लिए योग्यता निर्धारित करना $जरूरी है।


अमूमन लोग उसी समय हल ढूँढने लगते हैं जब कोई समस्या उठ खड़ी होती है। आफत आने से पहले एहतियात बरतने की सुध अकसर बिरले ही किसी में होती है। जो लोग बाहर हैं, उनकी कोई समस्या नहीं है। यदि कोई समस्या आ भी जाए, उनकी मदद करने के लिए कई लोग हैं।


लेकिन जेल में रहने वाले सभी लोगों के सामने कोई न कोई समस्या बनी रहती है। इसीलिए तो वे जेल के अंदर हैं। इनकी मदद करने के लिए जेल में कोई नहीं है। इसलिए क्यों न हम वहाँ जाकर जागरूकता पैदा करें? $जरूर करना चाहिए।


खास तौर से विचारणाधीन कैदियों को कानून की बातें सिखाकर उनकी सहायता करनी चाहिए। इसके $जरिए अगर मुकदमा सही है तो कानून का पक्ष लेते हुए उन्हें न्यायपूर्ण दंड दिला सकते हैं। यदि मुकदमा झूठा है तो सजा से मुक्त होने में उनकी मदद करनी चाहिए। इस तरह अदालत के समय की बचत हो सकती है। आम जनता को कानून के प्रति सजग बनाने के मकसद और उसी जोश में मैंने अपने ऊपर जारी एक वारंट से फायदा उठाते हुए करीब डेढ़ साल मुकदमा लड़कर गिरफ्तारी दी और चेन्ïनै के केंद्रीय कारागार में ८३ दिनों तक कैद में रहने का अनुभव अनुभव पाया।


मेरे विचार में इस प्रक्रिया से पुलिस और जूरियों ने कानून की कई बातें जान लीं। लेकिन विचारणाधीन कैदियों और सजायाफ्ता कैदियों में मेरी प्रतीक्षा के विपरीत प्रतिक्रिया हुई।


विचारणाधीन कैदियों को मेरा चिंतन समझ में नहीं आया। कारण, 'वकीलों के रहते हमें कानूनी ज्ञान से क्या लेना देना है यही विचार इसमें आड़े आ रहा था।
इसके विपरीत, 'सजायाफ्ता कैदियों ने मेरे चिंतन को खूब अच्छी तरह पकड़ लिया। उन्हें पछतावा होने लगा, 'अरे कानून तो हमारे पक्ष में था मगर सही ढंग से दलील पेश करना नहीं आया तभी यह सजा मिली है। अगर मैं खुद अपना मुकदमा लड़ा होता तो बरी हो जाता। माना थोडी-बहुत सजा मिल भी जाती तब भी कोई खर्चा नहीं हुआ होता। सजा भी न्यायोचित लगती।


मैं कई लोगों को जानता हूँ जो अपना मुकदमा खुद लड़कर बरी हो गए थे। इनमें कुछ लोगों ने झूठा मुकदमा करने वाले लोगों पर मुकदमा दायर भी किया था।
पुस्तक के पहले संस्करण में मैंने इसके मूल उद्देश्य का खुलासा करते हुए बताया था कि कानूनी ज्ञान की $जरूरत किसलिए है और खुद अपना मुकदमा लडऩे का प्रयोजन क्या है। सुधी चिंतकों और पत्रकारों ने अपने न$जरिए पर जो प्रतिक्रिया दी, उनकी समीक्षाओं ने मुझे नया उत्साह प्रदान किया। उन्हें शुक्रिया अदा करने के लिहाज से पत्रकारों की समीक्षा को संकलित करके आमुख के रूप में जोड़ दे रहा हूँ।


पत्रकारों की समीक्षा को आमुख के रूप में जोडऩा एक नया निराला प्रयोग है। मेरा यही मंतव्य है कि इसके द्वारा पाठकों को पुस्तक के महत्व का आभास हो सकेगा। मेरी हार्दिक कामना है कि इस पुस्तक में लिखित विचारों के व्यापक प्रचार कार्य को भारत के आम नागरिक से लेकर समाचार माध्यम तक अपना सामाजिक कर्तव्य समझकर करें।


मेरी यह भी गुजारिश है कि इस किताब का प्रत्येक पाठक इसके बारे में अपनी राय से मुझे अवगत कराएँ।


खरगोश की जीत होगी ही।
कछुआ भी जीत लेगा; लेकिन
अकर्मण्यता नहीं जीतेगी।


इसलिए आएँ हम सब मिलकर कोशिश करें। कानून की जानकारी पाएँ। जीवन को समझ लें।
स्वयं लाभ उठाएँ। देश के लिए उपयोगी बनें।


कानून की सजगता के प्रति समर्पित
वारंट बाला
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