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Saturday, May 4, 2013

समाज के पंचेंद्रिय सदृश पाँच कानूनी पुस्तकें


समाज के पंचेंद्रिय सदृश पाँच कानूनी पुस्तकें


Mahatma Gandhiशरीर-संचालन के लिए जिस तरह पंचेंद्रियाँ आवश्यक हैं उसी तरह समाज के सम्यक्ï प्रवर्तन के लिए पाँच कानूनी पुस्तकें अनिवार्य हैं। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए इन पुस्तकों की रचना की योजना बनाई गई है। प्रस्तुत पुस्तक इन्साफ की तलाश में : अपराध विचारण  के अतिरिक्त जमानत लेने की प्रविधि, विधि विश्वकोश और कानून आपकी जेब में  ये किताबें निकल चुकी हैं।


'इन्साफ की तलाश में : अपराध विचारण आपके हाथों में है। इसे हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित करना सरल कार्य नहीं था। बड़ी कठिनाइयों का सामना करने के बाद ही यह काम संभव हुआ। पाठकों से माँग और आवश्यक समर्थन मिलने पर शेष किताबों के हिंदी संस्करण निकालने का प्रयास किया जाएगा।


गत दस वर्षों में कानूनी क्षेत्र में संघर्ष करते हुए कुछ नई जानकारियाँ मिलीं—इनमें से प्रमुख हैं 'एक आदर्श वकील के रूप में महात्मा गाँधी, 'साक्ष्य अधिनियम की अनूठी विशेषता, 'वकालत के पेशे में भी महात्मा गाँधी की ईमानदारी और 'वकालत के बारे में बापूजी के विचार। ये रोचक तथ्य मूल तमिल पुस्तक में नहीं हैं।



महात्मा गाँधी : एक आदर्श वकील


भारतीयों द्वारा अत्यंत आदरपूर्वक 'राष्टï्रपिता के नाम से पुकारे जाने वाले महात्मा गाँधी को दुनिया के अनेक देशों के नेता और प्रबुद्घ लोग उन्हें अपना मार्ग दर्शक मानते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि भारत में जो अपने को गाँधीजी के अनुयायी होने का दावा करते हैं उन्हें गाँधीजी से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मालूम नहीं हैं। मोहनदास गाँधी ने इंग्लैंड से बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। १० जून, १८९१ को उन्होंने वकालत के पेशे में प्रवेश किया। उस समय वे २३ वर्ष के थे। तब से लेकर बीस साल तक उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, भारत और इंग्लैंड में वकालत की।


जीवन में सत्य और अहिंसा का पालन करने का व्रत लेने वाले गाँधी जी वकालत के पेशे में ईमानदार रहते थे। कोई फरियाद या मामला लेकर आने वाले मुवक्किलों से वे बड़े सब्र के साथ पूरी बात सुनते थे। उनके पास प्राप्त काग$ज और सबूतों की पूरी छान-बीन करते। यदि वह आसामी वास्तव में पीडि़त पाया जाए, यानी यह मालूम हो जाए कि उसके साथ अन्याय हुआ है तभी वह उस मुकदमे की पैरवी करना स्वीकार करते थे। यदि वह व्यक्ति दोषी या आक्रामक लगे तो उस मुकदमे को हाथ में नहीं लेते थे। कई बार वे दोनों पक्षों को अपने कार्यालय में बुलाकर आपस में बातचीत करवाते थे और उनके बीच में सुलह करके मामले को निपटा देते थे।


ये सब बातें उनकी पुस्तक आत्मकथा (या सत्य के साथ मेरे प्रयोग) में दर्ज हैं। इस प्रकार मोहनदास करमचंद गाँधी अन्य वकीलों से अलग और अनूठे सिद्घ होते हैं।



वकालत करो, मगर समझकर


अधिवक्ता यानी वकील, दुनिया के चाहे किसी भी देश में हों, अपनी बिरादरी में एक अलिखित सिद्घांत का पालन कर रहें—'अपना मुवक्ïिकल अपराधी है यह बात स्पष्टï रूप से मालूम होने पर भी वे उनके पक्ष में पैरवी करना अपना फर्ज समझते हैं।


इसके आधार पर ही किसी भी मुवक्ïिकल का वकील प्रत्येक मामले में वकालतनामा पेश करते हैं। दरअसल 'वकालत उर्दू का लफ्$ज है। इसका अर्थ बनता है, 'पक्ष में बोलने का अधिकार। 'पक्ष में बोलना, इसका मतलब बनता है, चाहे किसी ने अच्छाई की हो या बुराई, उसके कारणों को आगे रखकर उस कार्य को उचित ठहराते हुए बोलना।


वकील लोग कई बार यों बुरे कृत्यों पर लीपापोती करते हुए उन्हें सही ठहराने की कोशिश करते हैं, इसीलिए अकसर मुकदमा जीत नहीं पाते। वैसे वकील लोग मुकदमा हार जाने के बारे में चिंता भी नहीं करते। कारण उन पर हार-जीत का कोई असर नहीं पड़ता। दोनों स्थितियों में उनकी आमदनी घटती नहीं, बढ़ती ही रहती है। मुकदमा जीतने पर उसी बिना पर अपनी पूरी फीस दुह लेते हैं। हार जाने की हालत में, अपील करने पर पक्ïकी जीत का दिलासा देकर मुवक्ïिकल से पैसा उगलवा लेते हैं।


इसलिए विधि-क्षेत्र के अपने शोध से मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि ज्ञान और बोध के स्तर पर सोचा जाए तो मुवक्ïिकल का पक्ष लेकर पैरवी करना गलत है। तथ्य को समझकर बोलना ही उचित है।


जी हाँ, व्यक्ति के दोषी होने या निर्दोष होने की स्थिति का सुलझे हुए मन से विवेचन करने के बाद जो भी सत्य है उसका पक्ष लेते हुए इंसा$फ माँगना ही न्यायोचित कर्तव्य है। वकील भाई सोच सकते हैं, 'न्याय और औचित्य की बात तो सही है, मगर इससे हमारी आमदनी के $जरिये पर पानी फिर जाएगा न? उनका यह चिंतन सही नहीं है।


लोग आये दिन अनेक समस्याओं से जूझते हैं। लेकिन उनके निवारण हेतु न्याय माँगने के लिए आगे नहीं आते। कारण यह है कि अदालत में कोई मुकदमा दायर करने पर उसका निपटारा होने के लिए सालों लग जाते हैं। न्याय-प्रक्रिया यदि दो-एक हफ्ते में पूरी होने की उम्मीद हो तो मुकदमों की संख्या कई गुना बढऩे की संभावना है। इससे वकीलों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी, यही नहीं दो-एक हफ्ते में फैसला हो जाने की खुशी में मुवक्ïिकल बोनस के रूप में कुछ और धन दे भी सकते हैं।


ऐसी बात सुनकर वकीलों समेत कुछ लोग सोचते होंगे कि हमारे देश में यह तो शेखचिल्ïली का सपना जैसा है, हमारे देश में यह सब होने का नहीं है। उनकी यह सोच भी गलत है।


हमारे देश में जन्म लेकर स्वदेश में और विदेशों में बीस साल तक के अपने वकालत के जीवन के माध्यम से मोहनदास करमचंद गाँधी जी ने इसे सत्य बात साबित कर दिया। सच तो यह है कि हमारे देश के वकील और न्यायाधीश देश के विधि-विधानों से अनभिज्ञ हैं, तभी तो निचले स्तर के न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक में एक ही मुकदमे पर अलग-अलग फैसले दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में केवल गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में वर्षों तक सफलतापूर्वक वकालत का अपना पेशा चलाने में समर्थ कैसे हुए? स्वयं गाँधी जी ने इसका उत्तर नहीं दिया है।


तो अपने पेशे में सफल होने के लिए क्या गाँधी जी ने देश-विदेश के विधि-विधानों का विश्ïलेषण करके उनमें पारंगत हो गए थे? अपने इस बारीक सवाल का उत्तर ढूँढ़ते हुए जब मैंने उनकी आत्मकथा (अथवा सत्य के साथ मेरे प्रयोग) सहित अनेक पुस्तकों का अनुसंधान किया तो मुझे इस तथ्य का पता चला।


महात्मा गाँधी को भी एक निश्चित कानून के अलावा और किसी कानून पर विशेषज्ञता प्राप्त नहीं थी—यही वह तथ्य है। वे जिस कानून के विशेषज्ञ थे वह है 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम।


प्रत्येक देश में विभिन्न प्रकार के कानून होते हैं। किसी देश के कानून में जो कार्य अपराध माना जाता है, यह $जरूरी नहीं है कि किसी दूसरे देश में वह अपराध माना जाए। इसी तरह दंड सभी देशों में एक जैसा नहीं होता। लेकिन साक्ष्य अधिनियम के बारे में यह बात नहीं है।


क्योंकि यदि यह सच है कि सभी देशों में आदमी मुँह से ही बोलते हैं, आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, काग$ज पर कलम से लिखते हैं, हथियार से ही हमला करते हैं, तो इसी तर्क के आधार पर मैंने जाना कि साक्ष्य का कानून भी सभी देशों में एक जैसा ही होना चाहिए। साक्ष्य अधिनियम में पूरी तरह निष्ठïा रखने के कारण ही गांधीजी के लिए विभिन्न देशों के न्यायालयों में सफलता पूर्वक वकालत करना असाधारण रूप से साध्य हुआ।



वकीलों के बारे में गाँधीजी के विचार


गाँधीजी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज के ग्यारहवें अध्याय में वकीलों के संबंध में बताया है :


''वकालत का पेशा सच्चरित्रता नहीं सिखाता। इस पेशे में आने वाले लोगों का मकसद मह$ज धन कमाने का है, दुखी जनों की मदद करने का नहीं।


''मैं जानता हूँ जब लोगों के आपस में झगड़े-फसाद होते हैं तब वकील लोग खुश हो जाते हैं। ये सगे भाइयों को जानी दुश्मन बना देते हैं। दु:ख की बात है कि ये लोग शारीरिक काम से जी चुराते हैं और ऐशा आराम में डूबे रहते हैं। इनके कारण कई परिवार तबाह हो गए हैं।


''यह समझना गलत है कि न्यायालय जनता के कल्याण के लिए बनाए गए हैं। अगर लोग अपने विरोध और वैमनस्य को आपस में बातचीत करके दूर करने लगें तो उनके ऊपर तीसरा कोई आदमी हावी नहीं हो सकता। न्याय कहाँ है, केवल संबंधित लोगों को इस बात का पता रहता है। तीसरे आदमी द्वारा दिया जाने वाला फैसला हमेशा न्यायपूर्ण रहेगा, यह जरूरी नहीं है।


''वकीलों के बारे में मैंने जो कुछ कहा है, वह बहुत हद तक न्यायाधीशों के विषय में भी सही है। जज लोग वकीलों के मौसेरे भाई जैसे ही हैं। दोनों एक दूसरे के हितों की रक्षा करने में तत्पर रहते हैं।


स्रोत : आत्मकथा या सत्य के साथ मेरे प्रयोग लेखक मो. क. गाँधी, प्रकाशक नव जीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद—३८००१४ (इस पते पर संपर्क करने पर आत्मकथा की प्रति प्राप्त हो सकती है या दिल्ïली राजघाट स्थित गाँधी पुस्तक भवन से भी मिल सकती है।)


                                —वारंट बाला

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பயின்றோர் (20-08-16)